संदेश

छात्रों के विजेता बनने पर समर्पित

जद्दोजहद थी लड़ने की, इरादा था कुछ करने की।  पूरा किया है वो मुकाम, उस ऊंचाई पर बस चढ़ने की। जिनके हुनर में अय्यारी है। जिनके जश्न की तैयारी है।। दिल संभाल के बैठो दोस्तों। क्योंकि अब विजेताओं की बारी है।। जो भाग्य भरोसे जीता है। वो हर मोड़ पर ठोकर खाता है।। जो मेहनत और जज्बा दिखलाता है  हर शिखर कदमों में झुक जाता है।। चाहे बोर्ड का, इम्तिहान हो। या खेल का, मैदान हो।। हर कोई विजेता है इसमें।। ये हर जीत का, सम्मान हो।। ये जीत की खुश्बू है, मेहनत का पसीना है। इस खेल के मंदिर में, शोहरत का मदीना है।। जो मुश्किलों से नहीं घबराया, पैरों से नहीं लड़खड़ाया। वो आसमां की बुलंदी का, नायाब नगीना है।। गर उम्मीद और जज्बात हो, मन में हर पल सवाइलात हो। वह कैसे नाकामयाब हो सकता है। गर भरोसा तेरे साथ हो।। कभी कभी मेर दिल में।। चेहरे की रवानिया कुछ तो कह जाएंगी गाने की बोल का साज बन जाएंगी। कुछ चेहरे मुस्कुराएंगे तो कुछ साथ निभाएंगे, इन बच्चों की शरारत सबको हंसा जाएंगी।। मेहनत हमेशा रंग लाती है।। जीत एजज़्बात खुशियां बरपाती है।। तुम कोई भी प्रतिभा दिखाओ।। उत्साह और उमंग हर जीत दिला जाती है।। सा...

प्राचार्य एस के श्रीवास्तव जी और मुद्गल परिवार

 निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता से भरपूर दिशा निर्देशन एवं सामंजस्य से रहे हमेशा पूर।। कर्मयोगी, जुझारूपन और अद्भुत प्रशासक। पर ईर्ष्या और तृश्णा से रहे हमेशा दूर।।                 के लिए प्राचार्य के वि न 1ए एफ एस गोरखपुर  दोनों ही जोड़ी ने अद्भुत श्रम लिखलाया है। अपने ज्ञान और विवेक से विद्यालय को चमकाया है। कर उपयोग कुशाग्र बुद्धि का ।। डाक्टर और कलाकार बनाया है।।                   मुद्गल सर एवं अनीता मैडम के लिए कोइ खुश हैं तो कोई मजबूर है।। विदा होना तो इस केवीएस का दस्तूर है।। भले जुदा हम हो रहे, भले मन से रो रहे। दिल से जुदा न होना, चाहे कितना भी हम दूर है।।                                   विदाई हेतु संदेश।। नया आयाम नया किरदार फिर बनाना है।। सरकारी मुलाजिम को हर फर्ज निभाना है।। दुख तो होगा आपके जाने का।। पर खुशी से संघर्ष को जीवन में लाना है।।

मेरी कविताएं

  कविता संग्रह   मेरी कविताएं  

श्री सुशील कुमार कुमार कन्नौजिया जी के सेवानिवृत्त होने पर मेरे द्वारा प्रस्तुत शेर एवं शायरी।।

 जैसा कि एक दिन पूर्व श्री सुशील कुमार कन्नौजिया, प्र. स्ना. शिक्षक कला से वार्तालाप में गालीब जी की एक शेर सुनाया जिसमें मुझे अप्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया।। मुझे याद तो नहीं पर अन्त की कड़ी याद है- वफ़ा को वफ़ा से ढूंढता हूं। जिसके जवाब में मैंने अपनी सफाई दी जो कुछ इस तरह है- वफा की अदावत क्या करें। वफ़ा की इनायत क्या करें।। उन्हें जब इजहार ही वफ़ा नजर आए। तो वफ़ा की कवायद क्या करें।। दूसरा शेर- वफ़ा सिर्फ इज़हार नहीं होता। वफ़ा सिर्फ इकरार नहीं होता।। वफ़ा खुलूशियत से निभाने का नाम है। सिर्फ दिदार ही वफ़ा का एतबार नहीं होता।। विदाई पर श्री कन्नौजिया सर हेतु कुछ लाइनें- हंसमुख मिज़ाज, रसिक जनाब, और शायराना अंदाज़ आपको भाता है। आपके जुबां से दिलकश पूराने नग्में बरबस निकल जाता है। कला की काबिलियत को जाने कहां जज्ब कर गए थे। वरना आपके नाम के चर्चे, हशरतों से लिया जाता है।। गुज़ारिश कि ! आपकी विदाई अंजाम नहीं आगाज़ है। क्यों कि उन बुलंदियों पर आपका नाम लिया जाता है।। धन्यवाद।। लेख--- तालिबान की जो क्रूरता और और बर्बरता है, वो किसी धर्मांधता से कम नहीं है ।। उनके विचार में बर्बरता ...