श्री सुशील कुमार कुमार कन्नौजिया जी के सेवानिवृत्त होने पर मेरे द्वारा प्रस्तुत शेर एवं शायरी।।

 जैसा कि एक दिन पूर्व श्री सुशील कुमार कन्नौजिया, प्र. स्ना. शिक्षक कला से वार्तालाप में गालीब जी की एक शेर सुनाया जिसमें मुझे अप्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया।।

मुझे याद तो नहीं पर अन्त की कड़ी याद है-

  • वफ़ा को वफ़ा से ढूंढता हूं।

जिसके जवाब में मैंने अपनी सफाई दी जो कुछ इस तरह है-

  • वफा की अदावत क्या करें।
  • वफ़ा की इनायत क्या करें।।
  • उन्हें जब इजहार ही वफ़ा नजर आए।
  • तो वफ़ा की कवायद क्या करें।।
दूसरा शेर-
  • वफ़ा सिर्फ इज़हार नहीं होता।
  • वफ़ा सिर्फ इकरार नहीं होता।।
  • वफ़ा खुलूशियत से निभाने का नाम है।
  • सिर्फ दिदार ही वफ़ा का एतबार नहीं होता।।
विदाई पर श्री कन्नौजिया सर हेतु कुछ लाइनें-

  • हंसमुख मिज़ाज, रसिक जनाब, और शायराना अंदाज़ आपको भाता है।
  • आपके जुबां से दिलकश पूराने नग्में बरबस निकल जाता है।
  • कला की काबिलियत को जाने कहां जज्ब कर गए थे।
  • वरना आपके नाम के चर्चे, हशरतों से लिया जाता है।।
  • गुज़ारिश कि ! आपकी विदाई अंजाम नहीं आगाज़ है।
  • क्यों कि उन बुलंदियों पर आपका नाम लिया जाता है।।

धन्यवाद।।

लेख---

तालिबान की जो क्रूरता और और बर्बरता है, वो किसी धर्मांधता से कम नहीं है ।।
उनके विचार में बर्बरता और क्रूरता ही उनकी संस्कृति हो गयी है।।
सदैव अनन्य वर्षों से जिन अपकर्मों को हम माथे से लगाये फिरते हैं वो भी कहीं न कहीं लोगों में संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगी।।
जिस दिन ब्यक्तिविशेष धर्म जाति नस्ल और लिंग भेद से मुक्त होकर राष्ट्रहित, विश्वहित, यहां तक कि ब्रह्मांड हित में सोचने लगेगा उसी दिन मानव संस्कृति की स्थापना हो जायेगी।। और उसे हम किसी भी धर्म में प्रतिस्थापित करते हैं तो वह स्वतः एक मजबूत संस्कृति के रूप धारण कर लेगा।।

जब किसी को क्रूरता और बर्बरता ही सकारात्मक सोच बन जाये तो अफगानिस्तान में तालिबानी जैसे लोग सदैव हमला करते रहेंगे।।

हम अपने ही देश में राजनीतिक संस्कृति को ही देखें राजसत्ता प्राप्त करने के लिए रोज हिन्दू-मुस्लिम जात-पात का बोध कराया जा रहा है जिसमें चौथा स्तंभ लगातार मानसिक रूप से हम पर हावी है।।

आपस में वैमनस्यता पैदा कर राजनीतिक तंत्र मनोवैज्ञानिक तौर पर धर्म की संस्कृति को अपने अनुसार प्रभावित कर रहा है।।
धन्यवाद।।।

खामियां हजारों हैं पर पर्दे में छुपा जाता हूं।।
यह कौन-सी बदहवासी है जिसे जाहिर नहीं कर पाता हूं।।
हजारों सितम हैं इस जहां में मजहब का रंग देखकर।।
लाख ठोकरें खाकर भी मैं फिर कांटों से ही लिपट जाता हूं।।

जयहिंद जय भारत।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छात्रों के विजेता बनने पर समर्पित