संदेश

जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्री सुशील कुमार कुमार कन्नौजिया जी के सेवानिवृत्त होने पर मेरे द्वारा प्रस्तुत शेर एवं शायरी।।

 जैसा कि एक दिन पूर्व श्री सुशील कुमार कन्नौजिया, प्र. स्ना. शिक्षक कला से वार्तालाप में गालीब जी की एक शेर सुनाया जिसमें मुझे अप्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया।। मुझे याद तो नहीं पर अन्त की कड़ी याद है- वफ़ा को वफ़ा से ढूंढता हूं। जिसके जवाब में मैंने अपनी सफाई दी जो कुछ इस तरह है- वफा की अदावत क्या करें। वफ़ा की इनायत क्या करें।। उन्हें जब इजहार ही वफ़ा नजर आए। तो वफ़ा की कवायद क्या करें।। दूसरा शेर- वफ़ा सिर्फ इज़हार नहीं होता। वफ़ा सिर्फ इकरार नहीं होता।। वफ़ा खुलूशियत से निभाने का नाम है। सिर्फ दिदार ही वफ़ा का एतबार नहीं होता।। विदाई पर श्री कन्नौजिया सर हेतु कुछ लाइनें- हंसमुख मिज़ाज, रसिक जनाब, और शायराना अंदाज़ आपको भाता है। आपके जुबां से दिलकश पूराने नग्में बरबस निकल जाता है। कला की काबिलियत को जाने कहां जज्ब कर गए थे। वरना आपके नाम के चर्चे, हशरतों से लिया जाता है।। गुज़ारिश कि ! आपकी विदाई अंजाम नहीं आगाज़ है। क्यों कि उन बुलंदियों पर आपका नाम लिया जाता है।। धन्यवाद।। लेख--- तालिबान की जो क्रूरता और और बर्बरता है, वो किसी धर्मांधता से कम नहीं है ।। उनके विचार में बर्बरता ...